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संसद में बच्चों की मोबाइल लत पर चिंता

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राज्यसभा और लोकसभा में सांसदों ने बच्चों-किशोरों में बढ़ती स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत को बताया बड़ा संकट; सरकार से ठोस नीति और कानून की मांग

नई दिल्ली। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल स्क्रीन आज की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, मनोरंजन, संवाद, जानकारी और तकनीकी सुविधा—सब कुछ अब एक स्क्रीन के जरिए संभव है। लेकिन यही स्क्रीन जब बच्चों और किशोरों की दिनचर्या, व्यवहार और मानसिक स्थिति पर हावी होने लगती है, तो यह सुविधा एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है। शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में यही चिंता प्रमुखता से सामने आई, जहां सांसदों ने बच्चों और युवाओं में बढ़ती स्क्रीन की लत, सोशल मीडिया निर्भरता, ऑनलाइन गेमिंग, साइबर बुलिंग और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा सवाल उठाया।

राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए कहा कि बच्चों और किशोरों का अत्यधिक समय मोबाइल और टीवी स्क्रीन पर बीत रहा है, जिसके दूरगामी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। वहीं लोकसभा में कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने बच्चों के बीच सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए कानून लाने की मांग की।

राज्यसभा में उठा स्क्रीन टाइम का मुद्दा

उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान डेरेक ओ’ब्रायन ने बच्चों और युवाओं में बढ़ती स्क्रीन निर्भरता को “चिंताजनक और खतरनाक” करार दिया। उन्होंने सदन में कुछ अध्ययनों और रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि मोबाइल और स्क्रीन की लत का असर केवल पढ़ाई या व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक स्थिरता, नींद, एकाग्रता और सामाजिक जीवन तक को प्रभावित कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज बड़ी संख्या में बच्चे और किशोर प्रतिदिन कई-कई घंटे मोबाइल, टीवी, टैबलेट और अन्य स्क्रीन डिवाइस पर बिताते हैं। यदि पूरे साल का औसत निकाला जाए, तो यह समय जीवन के एक बड़े हिस्से को निगल जाता है। उनके मुताबिक, यह सिर्फ समय की बर्बादी नहीं, बल्कि एक ऐसी आदत बनती जा रही है जो धीरे-धीरे मानसिक और सामाजिक नुकसान पहुंचाती है।

“हर समय स्क्रीन से चिपके रहने” के खतरे पर चिंता

सांसदों ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों का लगातार स्क्रीन से चिपके रहना कई स्तरों पर नुकसानदेह हो सकता है। विशेषज्ञों के हवाले से संसद में कहा गया कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की नींद प्रभावित होती है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है, मूड स्विंग्स तेज होते हैं, और एंग्जायटी यानी चिंता की समस्या भी बढ़ सकती है।

कई अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक मोबाइल और सोशल मीडिया में डूबे रहने वाले बच्चों में ध्यान की कमी, शारीरिक निष्क्रियता, सामाजिक अलगाव, आत्मविश्वास में गिरावट, और कई मामलों में अवसाद जैसी स्थितियां भी देखने को मिल सकती हैं। यही कारण है कि संसद में इस विषय को केवल “पालन-पोषण” या “आदत” का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक नीति का मुद्दा माना गया।

स्कूलों में मोबाइल पर रोक का अंतरराष्ट्रीय उदाहरण

राज्यसभा में चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि दुनिया के कई देशों ने स्कूल परिसरों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण लागू किए हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को पढ़ाई के समय डिजिटल विचलन से बचाना, सामाजिक संवाद को बढ़ावा देना और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को कम करना है।

सांसदों ने कहा कि भारत में भी इस दिशा में गंभीर बहस की जरूरत है। सवाल यह नहीं है कि तकनीक का इस्तेमाल हो या न हो, बल्कि यह है कि उसका इस्तेमाल कब, कितना और किस उद्देश्य से हो। अगर बच्चों की शिक्षा और मानसिक संतुलन प्रभावित हो रहा है, तो संस्थागत स्तर पर नीति बनाना जरूरी हो जाता है।

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सरकार से मांगी गई बहुस्तरीय रणनीति

राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सांसद ने सरकार से अपील की कि वह केवल चेतावनी जारी करने तक सीमित न रहे, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति बनाए। इसमें जिम्मेदार स्क्रीन उपयोग, ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा, खेल-कूद, परिवारिक संवाद, और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शामिल होनी चाहिए।

मांग यह भी उठी कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रभाव पर केवल माता-पिता या स्कूलों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सरकार, शिक्षण संस्थान, टेक कंपनियां, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समाज—सभी को मिलकर काम करना होगा।

लोकसभा में सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग पर सख्त कानून की मांग

उधर लोकसभा में कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने बच्चों और किशोरों के बीच तेजी से बढ़ रही सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की लत को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में बच्चे घंटों तक रील्स, शॉर्ट वीडियो, स्क्रोलिंग, और ऑनलाइन गेम्स में उलझे रहते हैं, जिससे उनका मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है।

उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि बच्चों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के उपयोग को विनियमित करने के लिए एक स्पष्ट और सख्त कानून लाया जाए, ताकि कम उम्र में स्मार्टफोन और इंटरनेट की अनियंत्रित पहुंच से पैदा हो रहे जोखिमों को कम किया जा सके।

कम उम्र में स्मार्टफोन की लत बना रही है बड़ा संकट

लोकसभा में यह मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया कि बच्चों को बहुत कम उम्र में स्मार्टफोन मिल जाना अब एक नई सामाजिक चुनौती बन गया है। पहले जहां बच्चे मैदान, किताब, परिवार और दोस्तों के साथ अधिक समय बिताते थे, वहीं अब उनका बड़ा हिस्सा स्क्रीन के भीतर सिमटता जा रहा है।

यह बदलाव सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। सांसदों ने कहा कि स्मार्टफोन की लत बच्चों की शारीरिक गतिविधि, आंखों की सेहत, नींद के चक्र, भाषा विकास, और मानसिक संतुलन पर भी असर डाल रही है। खासतौर पर किशोरावस्था में, जब व्यक्तित्व और भावनात्मक समझ विकसित हो रही होती है, तब डिजिटल दबाव और तुलना की संस्कृति ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है।

ऑनलाइन सट्टेबाजी और गेमिंग ऐप्स पर भी चिंता

चर्चा के दौरान एक और गंभीर पहलू सामने आया—ऑनलाइन सट्टेबाजी और पैसों वाले गेम्स का बढ़ता असर। सांसदों ने कहा कि कई गेम और ऐप्स बच्चों और युवाओं को “मनोरंजन” के नाम पर ऐसे सिस्टम में खींच रहे हैं, जहां पैसा जीतने का लालच, जोखिम भरा व्यवहार, और आदत आधारित जुड़ाव तेजी से बढ़ रहा है।

लोकसभा में यह भी कहा गया कि कुछ गेम्स में “तेजी से पैसा बढ़ने” का भ्रम पैदा किया जाता है, जिससे किशोर और युवा जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इससे मानसिक तनाव, निराशा, और कई बार आवेगपूर्ण फैसले भी जन्म ले सकते हैं।

सोशल मीडिया पर खुलेआम प्रचार का आरोप

सांसदों ने यह आरोप भी लगाया कि कई ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी से जुड़े प्लेटफॉर्म्स का प्रचार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खुले तौर पर हो रहा है। यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि इन प्लेटफॉर्म्स तक बच्चों और किशोरों की पहुंच बहुत आसान है।

ऐसे में मांग उठी कि सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय की जाए और बच्चों को लक्षित या उन तक आसानी से पहुंचने वाले भ्रामक, नशे जैसी आदत पैदा करने वाले और जोखिमपूर्ण डिजिटल कंटेंट पर कड़ी निगरानी हो।

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साइबर बुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न भी बड़ी चुनौती

इस पूरी बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा साइबर बुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, और डेटा गोपनीयता से भी जुड़ा रहा। सांसदों ने कहा कि बच्चे और किशोर अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसे दबाव, ट्रोलिंग, अपमानजनक टिप्पणियों और डिजिटल उत्पीड़न का सामना करते हैं, जिनसे उनका आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

ऑनलाइन दुनिया में होने वाला अपमान कई बार घर-परिवार या स्कूल तक तुरंत सामने नहीं आता, जिससे बच्चे चुपचाप तनाव झेलते रहते हैं। यही वजह है कि संसद में मांग की गई कि डिजिटल सुरक्षा को लेकर स्कूलों, माता-पिता, और नीति-निर्माताओं के बीच अधिक समन्वय होना चाहिए।

भारत के लिए क्या हो सकता है आगे का रास्ता?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल “मोबाइल छीन लेना” या “डांट देना” नहीं है। इसके लिए डिजिटल अनुशासन, उम्र के अनुसार कंटेंट नियंत्रण, स्क्रीन टाइम लिमिट, डिजिटल साक्षरता, और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है।

भारत जैसे बड़े और तेजी से डिजिटाइज हो रहे देश में यह मुद्दा आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण होगा। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल सेवाएं और इंटरनेट एक्सेस जरूरी हैं, लेकिन बच्चों के लिए सुरक्षित और संतुलित डिजिटल माहौल बनाना उससे भी ज्यादा जरूरी हो गया है।

निष्कर्ष: सुविधा और संकट के बीच संतुलन की चुनौती

मोबाइल फोन और डिजिटल स्क्रीन आज की दुनिया की जरूरत हैं, लेकिन बच्चों और किशोरों के लिए यही तकनीक कब एक गंभीर खतरे में बदल जाती है, इसका एहसास अब समाज और संसद—दोनों को होने लगा है। संसद में उठी यह बहस इस बात का संकेत है कि अब इस विषय को नजरअंदाज करना संभव नहीं है।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मुद्दे पर केवल चर्चा तक सीमित रहती है या फिर स्कूलों, परिवारों, टेक कंपनियों और नीति तंत्र को साथ लेकर कोई ठोस ढांचा तैयार करती है। क्योंकि सवाल केवल स्क्रीन का नहीं, बल्कि देश की अगली पीढ़ी के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक भविष्य का है।

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